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Book: मूढ़ LOCK Home
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ताजा राम (58)
पूराराम
SHOW TREE
मोबाइल
9999999999
मोबाइल 2
काम
Farmer
जन्म तिथि
1901-01-23
मृत तिथि
1960-01-10
विवाहित / अविवहित
विवाहित
Caste (ससुराल की जाति)
jat
पत्नी का नाम
h
पंचायत/ ब्लॉक / जिला
मोतियानिया का ताला — बाड़मेर ग्रामीण — बाड़मेर
लोकेशन (Lat/Lng)
पता
Notes
पारिवारिक इतिहास

विक्रम संवत 1952 के समय हमारे दादा के दौर में रामकेन और उनके भतीजे नंदराम का नाम क्षेत्र में प्रसिद्ध था। उस समय रामकेन डाकू थे और वे अपने भतीजे नंदराम के साथ मिलकर गाँवों में लूटपाट किया करते थे।
उसी वर्ष विक्रम संवत 1952 में नंदराम की मृत्यु नगर नाम के गाँव में हो गई।

इसके अगले वर्ष, विक्रम संवत 1953 में रामकेन की मृत्यु धवा डोली गाँव में बिश्नोइयों के साथ हुई मुठभेड़ में हो गई।

इसके बाद विक्रम संवत 1954 में नंदराम के भाई पूराराम का देहांत बीमारी के कारण हो गया।

फिर आया वह भयावह समय—
विक्रम संवत 1956, जब पूरे क्षेत्र में भयानक अकाल पड़ा। चारों ओर भूख, प्यास और पलायन का माहौल था।
उसी कठिन परिस्थिति में पूराराम के दोनों पुत्र—राजूराम और शोभाराम रोज़गार की तलाश में पाकिस्तान के सिंध प्रांत चले गए।

वे जाते समय अपनी बहन और छोटे भाई ताजाराम को नंदराम के घर छोड़ गए।
परंतु दुर्भाग्यवश, चार महीने बाद नंदराम की पत्नी ने उन्हें घर से निकाल दिया।

उस समय ताजाराम की उम्र मात्र 13 वर्ष थी।

इतनी छोटी उम्र में, अकाल के उस क्रूर समय में, ताजाराम ने स्वयं सिंध जाने का साहसिक निर्णय लिया।
रास्ते में पानी की भयंकर कमी थी। जब एक पानी की बेरी (कुआँ) दिखाई दी, तो प्राणों की परवाह किए बिना उन्होंने पानी पाने के लिए बेरी में छलांग लगा दी।
वह कुआँ गहरा था—बाहर निकलना संभव नहीं था।
पूरी रात ताजाराम उसी बेरी में फँसे रहे, अँधेरे, प्यास और भय के बीच केवल हिम्मत और जीवित रहने के संकल्प के सहारे।

अगली सुबह वे किसी तरह बाहर निकले और बाड़मेर पहुँचे।
अत्यधिक थकावट के कारण उन्हें नींद आ गई और रेलगाड़ी छूट गई।
लेकिन 13 वर्ष का वह बालक टूटा नहीं—
उन्होंने पैदल चलकर गढ़रा तक की यात्रा पूरी की और वहाँ से आगे बढ़ते हुए अंततः सिंध पहुँच गए।

सिंध में तीनों भाई लगभग 7 वर्षों तक रहे और वहाँ रेलवे में सरकारी नौकरी की—
• राजूराम — पेटमैन
• शोभाराम — जीआरपी (GRP)
• ताजाराम — टॉलीमैन

सात वर्षों की सेवा के बाद तीनों भाई अपने गाँव वापस लौट आए और फिर कभी सिंध नहीं गए।
उस समय तीनों सरकारी कर्मचारी थे ।

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